Space Effects on Brain:- अंतरिक्ष की यात्रा सुनने में जितनी रोमांचक लगती है, वास्तविकता में उतनी ही कठिन होती है। पृथ्वी पर हमारा पूरा शरीर करोड़ों वर्षों से गुरुत्वाकर्षण के अनुसार काम करने के लिए विकसित हुआ है। लेकिन जैसे ही कोई अंतरिक्ष यात्री माइक्रोग्रैविटी वाले वातावरण में पहुंचता है, शरीर के लगभग हर सिस्टम को खुद को नए माहौल के अनुसार ढालना पड़ता है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि अंतरिक्ष का असर केवल हड्डियों और मांसपेशियों पर पड़ता है, लेकिन वैज्ञानिकों की रिसर्च बताती है कि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से दिमाग की संरचना और उसके काम करने के तरीके में भी बदलाव आ सकते हैं। यही वजह है कि आज अंतरिक्ष विज्ञान में मानव मस्तिष्क पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभाव को लेकर लगातार अध्ययन किए जा रहे हैं।
Space Effects on Brain: माइक्रोग्रैविटी में दिमाग की स्थिति बदल सकती है
पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण लगातार दिमाग को अपनी सामान्य स्थिति में बनाए रखता है। लेकिन अंतरिक्ष में यह खिंचाव लगभग समाप्त हो जाता है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों का दिमाग खोपड़ी के अंदर हल्का ऊपर और पीछे की ओर खिसक सकता है। यह बदलाव देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन इससे दिमाग के आसपास मौजूद तरल पदार्थ यानी सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) का प्रवाह भी प्रभावित होता है।
सामान्य परिस्थितियों में यह तरल दिमाग और रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा करता है, लेकिन माइक्रोग्रैविटी में इसका वितरण बदल जाता है और सिर की ओर अधिक मात्रा में जमा होने लगता है। इसके कारण मस्तिष्क के वेंट्रिकल्स का आकार बढ़ सकता है। वैज्ञानिक अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि लंबे समय तक बने रहने वाले इन बदलावों का भविष्य में मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
सोचने और याददाश्त पर भी दिख सकता है असर
दिमाग का ग्रे मैटर सीखने, याददाश्त बनाने, निर्णय लेने और जानकारी को प्रोसेस करने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी में रहने से ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर दोनों में हल्के संरचनात्मक बदलाव हो सकते हैं।
कुछ अंतरिक्ष यात्रियों ने यह भी बताया है कि मिशन के दौरान उन्हें ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, सोचने की गति धीमी लगना और छोटे-छोटे फैसले लेने में अधिक समय लगने जैसी समस्याओं का अनुभव हुआ। इस स्थिति को आम भाषा में “स्पेस फॉग” कहा जाता है। हालांकि यह कोई स्थायी बीमारी नहीं है और अधिकतर मामलों में पृथ्वी पर लौटने के बाद धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो जाती है।
संतुलन बनाने वाला सिस्टम क्यों हो जाता है भ्रमित?
हमारे कान के अंदर मौजूद वेस्टिबुलर सिस्टम शरीर को यह समझने में मदद करता है कि ऊपर कौन-सी दिशा है और नीचे कौन-सी। यही सिस्टम शरीर का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण न होने के कारण इस सिस्टम को सामान्य संकेत नहीं मिल पाते। परिणामस्वरूप दिमाग कुछ समय के लिए भ्रमित हो जाता है। यही कारण है कि कई अंतरिक्ष यात्रियों को मिशन के शुरुआती दिनों में स्पेस मोशन सिकनेस का सामना करना पड़ता है। इसमें चक्कर आना, मतली, सिर भारी महसूस होना और शरीर का संतुलन बिगड़ना जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। पृथ्वी पर लौटने के बाद भी कुछ समय तक शरीर को फिर से सामान्य गुरुत्वाकर्षण के अनुसार खुद को ढालने में समय लगता है।
आंखों और देखने की क्षमता पर भी पड़ सकता है असर
अंतरिक्ष में सिर की ओर तरल पदार्थ बढ़ने से आंखों पर भी दबाव बढ़ सकता है। कई अंतरिक्ष यात्रियों में लंबे मिशन के दौरान धुंधला दिखाई देना, दूर की वस्तुओं को स्पष्ट न देख पाना या दृष्टि में हल्के बदलाव जैसी समस्याएं देखी गई हैं। वैज्ञानिक इसे स्पेसफ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो-ऑक्यूलर सिंड्रोम (SANS) से जोड़कर देखते हैं। इसी कारण लंबे अंतरिक्ष मिशनों में आंखों की नियमित जांच भी की जाती है।
क्या अंतरिक्ष विकिरण भी दिमाग को प्रभावित करता है?
माइक्रोग्रैविटी के अलावा अंतरिक्ष में मौजूद कॉस्मिक रेडिएशन भी वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है। पृथ्वी का वातावरण और चुंबकीय क्षेत्र हमें अधिकांश हानिकारक विकिरण से बचाते हैं, लेकिन अंतरिक्ष में यह सुरक्षा काफी कम हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इंसान लंबे समय तक चंद्रमा या मंगल ग्रह पर रहता है, तो विकिरण का असर दिमाग की कोशिकाओं और मानसिक क्षमता पर भी पड़ सकता है। इसी विषय पर अभी व्यापक रिसर्च जारी है।
क्या ये बदलाव हमेशा के लिए रहते हैं?
अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, अंतरिक्ष में होने वाले अधिकांश मानसिक और शारीरिक बदलाव स्थायी नहीं होते। पृथ्वी पर लौटने के बाद दिमाग धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति की ओर लौटने लगता है। हालांकि छह महीने या उससे अधिक समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों में कुछ संरचनात्मक बदलाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक लगातार यह अध्ययन कर रहे हैं कि इन प्रभावों को कम करने के लिए कौन-सी नई तकनीकें और एक्सरसाइज सबसे प्रभावी हो सकती हैं।
भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए क्यों है यह रिसर्च जरूरी?
दुनिया की कई अंतरिक्ष एजेंसियां आने वाले वर्षों में चंद्रमा और मंगल ग्रह पर लंबे मानव मिशन भेजने की तैयारी कर रही हैं। ऐसे अभियानों में अंतरिक्ष यात्रियों को महीनों तक पृथ्वी से दूर रहना होगा। इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि माइक्रोग्रैविटी और अंतरिक्ष का वातावरण मानव मस्तिष्क को किस तरह प्रभावित करता है। यदि इन प्रभावों को पहले से समझ लिया जाए, तो भविष्य के मिशनों को अधिक सुरक्षित और सफल बनाया जा सकता है।
अंतरिक्ष केवल शरीर की ही नहीं बल्कि दिमाग की भी परीक्षा लेता है। माइक्रोग्रैविटी के कारण मस्तिष्क की संरचना, संतुलन प्रणाली, याददाश्त और निर्णय लेने की क्षमता में अस्थायी बदलाव देखे जा सकते हैं। हालांकि अधिकांश प्रभाव पृथ्वी पर लौटने के बाद धीरे-धीरे कम हो जाते हैं, लेकिन लंबे अंतरिक्ष मिशनों के लिए इन बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। आने वाले समय में जैसे-जैसे मानव अंतरिक्ष अन्वेषण आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे दिमाग पर अंतरिक्ष के प्रभाव से जुड़ी रिसर्च भी और महत्वपूर्ण होती जाएगी।
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