Bhagat Singh death mystery: क्या गांधी जी भगत सिंह को बचा सकते थे? आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा सवाल!
भारत की आज़ादी की कहानी जितनी गर्व से भरी है, उतनी ही रहस्यमय भी। भगत सिंह का नाम जब भी लिया जाता है, तो दिल में एक सवाल ज़रूर उठता है —
“क्या महात्मा गांधी उन्हें बचा सकते थे?”
और अगर हाँ, तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
Bhagat Singh death mystery: वह ज्वाला जो बुझाई नहीं जा सकी
साल था 1928, जब लाला लाजपत राय की मौत के बाद भगत सिंह के अंदर गुस्से की आग भड़क उठी।
उसी आग ने 1929 में सांडर्स हत्या और फिर सेंट्रल असेंबली बमकांड जैसे ऐतिहासिक कदमों को जन्म दिया।
उनका मकसद हत्या नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन को झकझोरना था।
वो अपने देश के लिए मरने नहीं, बल्कि देश को जगाने निकले थे।
फांसी का आदेश और देश का गुस्सा
1931 में जब अंग्रेज़ों ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सज़ा सुनाई, तो पूरा देश उबल पड़ा।
हर तरफ एक ही मांग थी — “भगत सिंह को बचाओ!”
लोगों की निगाहें गांधी जी पर टिक गईं, क्योंकि उस वक्त वही सबसे मज़बूत राजनीतिक चेहरा थे।
गांधी-इरविन समझौता: उम्मीद या समझौता?
मार्च 1931 में गांधी जी और ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक बड़ा समझौता हुआ।
देश को उम्मीद थी कि इस बातचीत में गांधी जी, भगत सिंह की फांसी रोकने की मांग रखेंगे।
लेकिन जब समझौते के बाद भी भगत सिंह को फांसी दे दी गई, तो लोगों में ग़ुस्सा फूट पड़ा।
लोगों ने कहा —
“गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की, उन्होंने अंग्रेज़ों से समझौता कर लिया!”
क्या गांधी जी सच में कुछ कर सकते थे?
इतिहासकारों की राय यहां बंटी हुई है।
कुछ इतिहासकार कहते हैं —गांधी जी ने इरविन से clemency (दया याचिका) की अपील ज़रूर की थी, लेकिन अंग्रेज़ पहले ही फांसी का मन बना चुके थे। वो भगत सिंह को क्रांतिकारी नहीं, आतंकवादी मानते थे और उन्हें किसी भी हालत में माफ़ नहीं करना चाहते थे।
दूसरी तरफ कुछ लोग कहते हैं —
अगर गांधी जी सख़्ती से ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालते,
तो शायद फांसी टल सकती थी।
क्योंकि उस समय जनता उनके पीछे थी, और ब्रिटिश सरकार जनता के उबाल से डरती थी।
गांधी बनाम भगत सिंह: दो रास्ते, एक ही मंज़िल
गांधी जी अहिंसा और संवाद में विश्वास रखते थे,
जबकि भगत सिंह क्रांति और बलिदान में।
दोनों के रास्ते अलग थे, पर मंज़िल एक ही — आज़ादी!
फर्क बस इतना था कि एक ने क़लम से लड़ाई लड़ी,
और दूसरे ने क़ुर्बानी से इतिहास लिखा।
सच क्या है?
इतिहास का सच यही है कि भगत सिंह की फांसी से पहले गांधी जी ने दया याचिका की बात की थी,पर ब्रिटिश सरकार ने उसे ठुकरा दिया।
पर एक सवाल अब भी बाकी है —
क्या गांधी जी को और मज़बूती से नहीं बोलना चाहिए था?
शायद हाँ… शायद नहीं।
लेकिन इतना तय है कि भगत सिंह की फांसी ने देश की आत्मा को जगा दिया,
और आज़ादी की आग उस दिन और तेज़ भड़क उठी।
नतीजा: भगत सिंह मरे नहीं, वो विचार बन गए
23 मार्च 1931 को जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई,
तो पूरा भारत रोया नहीं — जाग गया।
भगत सिंह का बलिदान आज भी इस देश की मिट्टी में जिंदा है।
और चाहे गांधी हों या कोई और नेता —
आज़ादी का असली करिश्मा उन तीन फांसी के तख्तों पर ही शुरू हुआ था।
