Poultry Feed Price Hike: अगर आपको हाल के दिनों में अंडे, चिकन या दूध खरीदते समय पहले से ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं, तो इसके पीछे सिर्फ बाजार की सामान्य महंगाई जिम्मेदार नहीं है। इन चीजों की कीमत बढ़ने के पीछे एक ऐसी वजह है, जिसका सीधा संबंध मुर्गियों और पशुओं के चारे से है। दरअसल, चारे में इस्तेमाल होने वाले मक्का और सोयाबीन की कीमतों में बढ़ोतरी ने पोल्ट्री और डेयरी कारोबार की लागत बढ़ा दी है। इसका असर अब धीरे-धीरे आम लोगों की जेब पर भी दिखाई देने लगा है।
Poultry Feed Price Hike:-मक्का और सोयाबीन क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
अंडे और चिकन की कीमत समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि मुर्गियों को खिलाया क्या जाता है। पोल्ट्री फीड में मक्का सबसे अहम कच्चे माल में से एक है। ब्रॉयलर मुर्गियों के चारे में करीब 55 से 65 फीसदी तक मक्का इस्तेमाल होता है, जबकि अंडे देने वाली लेयर मुर्गियों के फीड में इसकी हिस्सेदारी लगभग 50 से 60 फीसदी रहती है।
सिर्फ मक्का ही नहीं, मुर्गियों को पर्याप्त प्रोटीन देने के लिए सोयाबीन मील का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। ब्रॉयलर फीड में करीब 25 से 30 फीसदी और लेयर फीड में लगभग 18 से 20 फीसदी तक सोयाबीन मील शामिल हो सकता है। इसलिए जब इन दोनों कच्चे माल की कीमत बढ़ती है तो उसका असर सीधे फीड की लागत पर पड़ता है।
यही वजह है कि मक्का और सोयाबीन की कीमतों में बदलाव को पोल्ट्री इंडस्ट्री काफी करीब से देखती है। फीड महंगा होने का मतलब है कि मुर्गी पालने की लागत भी बढ़ जाएगी।
मक्के की कीमत में लगातार बढ़ोतरी
मक्के की कीमतों में हाल के महीनों में तेजी देखने को मिली है। तमिलनाडु के इरोड जिले के अलंगेयम बाजार में अगस्त 2025 के दौरान मक्के की औसत कीमत करीब 2,537 रुपये प्रति क्विंटल थी। अगस्त 2026 में यह बढ़कर करीब 2,759 रुपये हो गई और अब कीमत लगभग 2,810 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है।
यह बढ़ोतरी सिर्फ किसानों या कारोबारियों के लिए ही मायने नहीं रखती। मक्का पोल्ट्री फीड का बड़ा हिस्सा है, इसलिए इसकी कीमत बढ़ने के साथ चारे की लागत पर भी दबाव बढ़ता है।
सोयाबीन मील भी पिछले साल से महंगा
सोयाबीन मील की स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर में अगस्त 2025 में सोयाबीन मील की कीमत करीब 38,186 रुपये प्रति टन थी। अगस्त 2026 में यह बढ़कर लगभग 58,156 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई। हालांकि अब कीमत में कुछ राहत आई है और यह करीब 50 हजार रुपये प्रति टन के आसपास है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह अभी भी काफी ऊंचे स्तर पर है।
सोयाबीन मील की कीमत में आई इस तेजी ने पोल्ट्री फीड बनाने वाली कंपनियों की लागत को प्रभावित किया है। इसका असर आगे चलकर अंडे और चिकन की कीमतों में भी दिखाई दे सकता है।
अंडे की कीमत ने भी बढ़ाई चिंता
चारे की बढ़ती लागत का असर अंडे के बाजार में भी देखा जा रहा है। दिल्ली में अंडे की फार्मगेट कीमत करीब 600 रुपये प्रति 100 अंडे के आसपास बताई जा रही है, जबकि खुदरा बाजार में एक अंडे की कीमत लगभग 7 से 9 रुपये तक पहुंच रही है।
जुलाई में अंडे की औसत कीमत करीब 670.50 रुपये प्रति 100 अंडे रही थी। यह पिछले साल की तुलना में लगभग 38.7 फीसदी ज्यादा थी। एक समय कीमत 725 से 730 रुपये प्रति 100 अंडे तक भी पहुंच गई थी।
हालांकि अंडे की कीमत सिर्फ चारे पर निर्भर नहीं करती। मांग, मौसम, उत्पादन और बाजार में सप्लाई जैसे कई दूसरे कारण भी कीमत को प्रभावित करते हैं। लेकिन उत्पादन लागत में बढ़ोतरी निश्चित तौर पर दबाव बढ़ाती है।
चिकन पालना भी हुआ महंगा
पोल्ट्री कारोबार में सबसे बड़ा खर्च फीड पर ही आता है। पिछले कुछ महीनों में लेयर मुर्गियों के चारे की कीमत करीब 24-26 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 30-32 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। वहीं ब्रॉयलर फीड की कीमत भी लगभग 40 रुपये से बढ़कर 46 रुपये प्रति किलो हो गई है।
ब्रॉयलर मुर्गी को बाजार के वजन तक पहुंचने में आमतौर पर करीब 35 से 42 दिन लगते हैं। इस दौरान उसे लगातार फीड देना पड़ता है। ऐसे में प्रति किलो चारे की कीमत में कुछ रुपये की बढ़ोतरी भी बड़े स्तर पर उत्पादन करने वाले किसानों और पोल्ट्री कारोबारियों की लागत को काफी प्रभावित कर सकती है।
पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के अनुसार ब्रॉयलर की उत्पादन लागत करीब 110 रुपये प्रति किलो के आसपास है। इसलिए अगर फीड लगातार महंगा होता है तो कारोबारियों के लिए पुरानी कीमत पर चिकन बेचना मुश्किल हो सकता है।
दूध की कीमत पर भी क्यों पड़ सकता है असर?
मक्का सिर्फ पोल्ट्री इंडस्ट्री के लिए जरूरी नहीं है। पशुओं के चारे में भी इसका इस्तेमाल होता है। पशु आहार में मक्के की हिस्सेदारी करीब 15 से 20 फीसदी तक हो सकती है। इसके अलावा पशुओं को प्रोटीन देने के लिए अलग-अलग तिलहनों और उनसे निकलने वाली खली का इस्तेमाल किया जाता है।
इसलिए चारे की लागत बढ़ने का असर डेयरी किसानों पर भी पड़ सकता है। अगर पशुओं को पालने और दूध उत्पादन की लागत लगातार बढ़ती है, तो इसका असर आगे चलकर दूध की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
पशुधन अब कृषि अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा
भारत में पशुधन क्षेत्र की भूमिका पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। 2013-14 में पशुधन से जुड़े कामों से आने वाली कीमतें फसल क्षेत्र की कीमतों से करीब 34 फीसदी ज्यादा थीं। 2023-24 तक यह अंतर बढ़कर करीब 57 फीसदी हो गया।
इसका मतलब साफ है कि दूध, अंडे, मांस और दूसरे पशु उत्पाद अब भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में पहले की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुके हैं। ऐसे में चारे की कीमतों में होने वाला बदलाव सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर आम उपभोक्ता तक पहुंच सकता है।
आने वाले समय में मक्का सबसे बड़ा फैक्टर?
आगे की तस्वीर में सबसे ज्यादा नजर मक्के की कीमत पर रहेगी। सोयाबीन मील की कीमत में कुछ गिरावट आई है और नई फसल बाजार में आने के बाद इसकी उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है। लेकिन मक्के को लेकर चिंता अभी बनी हुई है।
इस साल खरीफ सीजन में मक्के की बुआई का क्षेत्र करीब 4.1 फीसदी कम बताया गया है। वहीं USDA के अनुमान के मुताबिक 2026-27 में भारत का मक्का उत्पादन करीब 50 मिलियन टन रह सकता है, जबकि 2025-26 में उत्पादन करीब 58.1 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर रहा था।
अगर उत्पादन कम रहता है और मांग मजबूत बनी रहती है, तो मक्के की कीमत पर दबाव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर पोल्ट्री और पशु आहार की लागत पर पड़ेगा।
एथेनॉल की मांग भी बढ़ा सकती है दबाव
मक्के की कहानी सिर्फ चारे तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में भी तेजी से हो रहा है। ऐसे में एक तरफ सरकार के सामने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का लक्ष्य है, तो दूसरी तरफ पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर को भी बड़ी मात्रा में मक्के की जरूरत है।
यही संतुलन आने वाले समय में काफी अहम रहने वाला है। अगर मक्के की उपलब्धता मांग के मुकाबले कम रहती है, तो इसकी कीमत बढ़ सकती है और फिर चारे से लेकर अंडे, चिकन और दूध तक पूरी सप्लाई चेन पर इसका असर पड़ सकता है।
आम आदमी की जेब पर कितना असर पड़ेगा?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का महंगा होने से अंडे, चिकन और दूध की कीमतें कितनी बढ़ेंगी। क्योंकि इनके दाम सिर्फ फीड की लागत से तय नहीं होते। बाजार की मांग, उत्पादन, मौसम, परिवहन और सप्लाई भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेकिन एक बात साफ है कि अगर मक्का और दूसरे फीड कच्चे माल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो उत्पादन लागत कम करना आसान नहीं होगा। ऐसे में आने वाले महीनों में अंडे और चिकन की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है और इसका असर धीरे-धीरे आम परिवार के महीने के बजट पर भी दिखाई दे सकता है।
