Civic Sense in India: भारत में जब भी सफाई, सिस्टम या भ्रष्टाचार की बात होती है, तो तुलना सीधे विदेशों से की जाती है। कहा जाता है कि वहाँ सड़कें साफ हैं, लोग नियम मानते हैं और सिस्टम बेहतर है। सवाल यह नहीं है कि ये बातें गलत हैं या सही — सवाल यह है कि क्या हमने कभी खुद से पूछा कि हम उस तुलना के लायक नागरिक हैं या नहीं?
Civic Sense in India: घर साफ, बाहर गंदगी: यह विरोधाभास क्यों?
हम अपने घर, दुकान और गाड़ी को पूरी जिम्मेदारी के साथ साफ रखते हैं। लेकिन वही व्यक्ति जब सड़क पर निकलता है, तो खाली बोतल, रैपर या थूक वहीं छोड़ देता है।
यह समस्या सफाई की जानकारी की नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी की भावना की है।
हम सार्वजनिक जगहों को अक्सर “किसी और की जिम्मेदारी” मान लेते हैं। यही सोच धीरे-धीरे गंदगी को सामान्य बना देती है और फिर हम कहते हैं कि “देश गंदा है”।
सफाई सिस्टम की नहीं, आदत की समस्या है
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि भारत में सफाई इसलिए नहीं होती क्योंकि सिस्टम कमजोर है। लेकिन सच यह है कि अगर आदत सही न हो, तो सबसे मजबूत सिस्टम भी फेल हो जाता है।
जहाँ लोग खुद नियमों का पालन करते हैं, वहाँ निगरानी कम लगती है। और जहाँ लोग नियम तोड़ने को चतुराई समझते हैं, वहाँ सख्ती भी असर नहीं दिखाती।
विदेश साफ इसलिए नहीं क्योंकि वहाँ लोग बेहतर हैं
यह मान लेना गलत होगा कि दूसरे देशों के लोग हमसे ज्यादा समझदार हैं। फर्क बस इतना है कि वहाँ rule-following को मजबूरी नहीं, सामान्य व्यवहार माना जाता है।
वहाँ लाइन तोड़ना चालाकी नहीं, शर्म की बात होती है।
वहाँ कचरा फेंकना छोटी गलती नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी का उल्लंघन माना जाता है।
यानी फर्क DNA का नहीं, daily behaviour का है।
भ्रष्टाचार: सिर्फ ऊपर की समस्या नहीं
भ्रष्टाचार पर हम सबसे ज्यादा गुस्सा करते हैं, लेकिन सबसे कम आत्ममंथन भी यहीं होता है।
अगर कोई नागरिक:
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काम जल्दी करवाने के लिए रिश्वत देता है
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नियम तोड़कर फायदा उठाता है
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गलत को “सब करते हैं” कहकर सही ठहराता है
तो वह भी उसी भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बन जाता है, जिसकी शिकायत वह करता है।
भ्रष्टाचार सिर्फ सत्ता की कमजोरी नहीं है, बल्कि नागरिक सहमति से चलने वाली समस्या भी है।
हर गलती के लिए सरकार को दोष देना आसान है
सरकार नीति बना सकती है, सड़क बना सकती है, कानून लागू कर सकती है। लेकिन सड़क पर कचरा फेंकने का फैसला सरकार नहीं करती — वह फैसला नागरिक करता है। अगर हम हर छोटी असुविधा के लिए सरकार को दोष देंगे, तो खुद को सुधारने की जरूरत कभी महसूस नहीं होगी।
बदलाव की शुरुआत कहाँ से होगी?
बदलाव किसी बड़े आंदोलन से नहीं, बल्कि छोटी व्यक्तिगत आदतों से शुरू होता है।
जब हम:
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कचरा हाथ में रखकर डस्टबिन तक ले जाते हैं
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नियम मानते हैं, चाहे सामने वाला न माने
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अपने बच्चों को सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी सिखाते हैं
तभी असली बदलाव दिखाई देता है।
देश सरकार से नहीं, नागरिकों से बनता है
देश की हालत पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन उससे पहले खुद से सवाल पूछना और भी जरूरी है।
जब तक हम:
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गंदगी को सामान्य
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नियमों को वैकल्पिक
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और भ्रष्टाचार को मजबूरी मानते रहेंगे
तब तक किसी भी सरकार से आदर्श देश की उम्मीद करना खुद को धोखा देना होगा।
जिस दिन नागरिक बदलेंगे, उसी दिन सिस्टम को भी बदलना पड़ेगा।
